63 वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन 30 नवंबर, 1-3 दिसंबर 2017, राँची (झारखण्ड) - पारित प्रस्ताव

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद

63 वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन

30 नवंबर, 1-3 दिसंबर 2017, राँची (झारखण्ड)

प्रस्ताव क्र. 1

शिक्षा क्षेत्र में सुधार हेतु ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ अत्यावश्यक

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद देश की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बनने में हो रही लगातार देरी पर गहन चिंता प्रकट करती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के तीन दशक बाद भी नई शिक्षा पद्धति की बाट-जोहता देश का शिक्षा जगत आज चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ वर्तमान केंद्र सरकार आर्थिक, सामरिक एवं आधारभूत संरचना के विषय में महत्वपूर्ण कदम उठा रही है वही देश की ढीली-ढाली उच्च शिक्षा की परिधि आज भी एक सर्जिकल स्ट्राइक के इंतजार में है। अभाविप का यह राष्ट्रीय अधिवेशन मांग करता है कि प्रस्तावित राष्ट्रीय शिक्षा नीति शीघ्रितशीघ्र देश के सामने लाई जाए।

एमएचआरडी की वर्ष 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार 799 विश्वविद्यालयों में से 540 राज्य विश्वविद्यालय हैं तथा लगभग 51 हजार उच्च शिक्षा संस्थानों में से 39 हजार से अधिक सम्बधित महाविद्यालय की संख्या के साथ यह तीन-चौथाई से भी कहीं अधिक है। परंतु फिर भी महाविद्यालयों के अंदर शिक्षकों की कमी, आधारभूत संरचना की कमी, पुस्तकालय में पुस्तकों की कमी एवं दशकों से दुरावस्था में शोषित पड़े परिसरों में नए सिरे से व्यवस्थाओं को खड़ी करने की आवश्यकता है। अभाविप का यह सुविचारित मत है कि शिक्षा क्षेत्र में भी जीएसटी कॉउंसिल की ही भांति केंद्र सरकार व प्रदेश सरकारें मिल कर देशहित में योजना लाएँ। साथ ही, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का यह राष्ट्रीय अधिवेशन मानता है कि अगर देश के विकास के लक्ष्य स्वरूप देश की युवा आबादी को स्किल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया-स्टैंड अप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं में आगे लाना है तो शिक्षा जगत में मूलभूत परिवर्तन लाना अपरिहार्य है।

सीबीसीएस के साथ सेमेस्टर पद्धति को लागू करने की अर्हता लेकर आए राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा) एक ओर क्लस्टर विश्वविद्यालय की योजना से दिग्भ्रमित तथा सम्बन्धित महाविद्यालयों की संख्या के नियामन में भी असफल रहा है। साथ ही शिक्षा की स्वायत्ता के ऊपर रूसा के उस अधिनियम ने गहरी चोट लगाई है जिसमें राज्य उच्च शिक्षा आयोग के माध्यम से आर्थिक संसाधनों के आवंटन का नियम रूसा के अंतर्गत लागू किया गया है, जिससे प्रदेशों में शिक्षण संस्थाओं के अगुवा अब राज्य सरकार के सचिवालय के चक्कर लगा रहे हैं। अभाविप का यह सुविचारित मत है कि ऐसे फेल रूसा को हटाकर, विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता एवं पुनः यूजीसी की भूमिका को सुस्थापित करने हेतु मार्च माह से खाली पड़े तीन अधिकारिक पदों-अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सचिव को तुरंत भरे जाने की मांग करती है।

सेमेस्टर सिस्टम से परीक्षाओंकी संख्या एवं बारम्बरता में बढोतरी से प्रदेश विश्वविद्यालय में पढ़ रहे लाखो विद्यार्थियों के शैक्षणिक कैलेंडर तथा प्रवेश से लेकर के परीक्षा परिणामों तक हो रही देरी के कारण यूजीसी द्वारा नियमित 180 दिन की पढ़ाई भी महाविद्यालयों में नहीं हो पा रही है। अतः परिषद का यह राष्ट्रीय अधिवेशन सेमेस्टर पद्धति को राज्य विश्वविद्यालयों में आधारभूत संरचना की भारी कमी को देखते हुए सम्बधित महाविद्यालयों के गैरव्यवसायिक स्नातक पाठ्यक्रमों से तुरंत हटाए जाने की मांग करता है।

PG स्तर पर सीटों की कमी, शिक्षक छात्र अनुपात अत्यधिक होना तथा शोध कार्य के गिरते स्तर के साथ ही पुराने केंद्रीय विश्वविद्यालयों का गिरता स्तर जिनमें पांडिचेरी एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय दोनों के ऊपर एमएचआरडी को जांच बिठाने तक की आवश्यकता पड़ी है। देश में आईआईटी, आईआईएस एवं अन्य राष्ट्रीय संस्थानों में निदेशक पद और प्रध्यापक स्तर में आईआईटी 35%, आईआईएम 26% तथा एनआईटी में 47% रिक्त पड़े पदों को भरे जाने में देरी शोचनीय है। अभाविप केंद्र सरकार से मांग करती है कि इन महत्वपूर्ण पदों को तुरंत प्रभाव से भरे जाने के लिए कदम उठाए।

शिक्षा को रोजगार एवं स्वावलंबन से जोड़ने के लिए स्कूली शिक्षा से ही महाविद्यालय स्तर पर भी नवाचार (Innovations) और पेटेंट हेतु प्रेत्साहन दिया जाना चाहिए। गुजरात सरकार द्वारा स्टूडेंट स्टार्टअप इनोवेशन पॉलिसी (SSIP) एवं केरल के स्टार्टअप विलेज आदि प्रयोगों के आधार पर अखिल भारतीय नवाचार एवं उद्यमिता नीति लानी चाहिए, जिसमे स्टार्टअप इंडिया के लक्ष्य की भी पूर्ति हो पाए।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद देश के बिखरे उच्च शिक्षा तंत्र जिसमें ज्ञान आयोग आधारित 1500 विश्वविद्यालय बनाने के लक्ष्य को क्लस्टर विश्वविद्यालय एवं 200 से अधिक संबंधित महाविद्यालय होने पर अलग विश्वविद्यालय बनाए जाने की पद्धति को अपनाये जाने की मांग करती है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की विशेष भौगोलिक आवश्यकता को देखते हुए केंद्रित विश्वविद्यालय खोलने की मांग करती है। केंद्र सरकार से शिक्षा हेतु जीडीपी का 6% खर्च और प्रदेश सरकारों से महाविद्यालयों एवं राज्य विश्वविद्यालयों में अधोसंरचना हेतु विशेष बजट आवंटित करने की मांग करती है।

अभाविप का यह राष्ट्रीय अधिवेशन शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए युवाओं से आहवान करता है कि देश के शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण बदलाव लाने के लिए परिसर से लेकर संसद तक यह संघर्ष जारी रखना होगा।

 

 

 

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद

63 वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन

30 नवंबर, 1-3 दिसंबर 2017, राँची (झारखण्ड)

प्रस्ताव क्र. 2

जनजातीय समाज : विकास के प्रति प्रतिबद्ध

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 63 वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन का सुविचारित मत है कि विपरीत परिस्थितियों में भी देश एकता और अखंडता को अक्षुण रखते हुए वन संस्कृति एवं परंपरा को जीवित रखने का काम जनजातीय समाज ने किया है। जनजातीय महापुरुषों ने सदैव स्वयं का बलिदान देते हुए भी सुदूर वनों -पर्वतों में लोक-कला संरक्षण एवं भारत-भक्ति की अलख जगाने का काम किया है।

यह दुर्भाग्य की बात है कि जहां एक ओर देश ने 70 वर्षों  में विकास के अनेक सपनों को छुआ है, वही जनजातीय समाज विकास की इस दौड़ से सदैव वंचित रहा है। अंग्रेजों द्वारा जनजातीय क्षेत्रों के लागू किए गए शोषणकारी कानूनों जैसे वन अधिनियम को स्वतंत्र भारत में भी ज्यों के त्यों लागू किया गया। जिसके कारण जनजातीय समाज पूर्ववत वंचित और शोषित रहा। लंबे समय तक केंद्र राज्य सरकारों ने जनजातीय समाज को उनके हाल पर ही छोड़ दिया, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और लोककला, परंपरा, संस्कृति का संरक्षण, संवर्धन का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। जनजातीय समाज को उपेक्षा का दंश झेलना पड़ा, जिसके कारण उनके मन में आक्रोश उत्पन्न होना स्वाभाविक था। इसे अवसर समझकर विदेशी अलगाववादी ताकतें, वामपंथी, माओवादी जैसे देश विरोधी शक्तियों ने जनजातीय समाज को गुमराह कर समाज के कुछ हिस्से को हिंसक मार्ग की ओर धकेल दिया है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का यह मत है कि जनजातीय समाज को विकास के मार्ग पर अग्रसर करने हेतु उनके मूलभूत आवश्यकताएं उपलब्ध कराने के लिए संघर्ष की आवश्यकता महसूस होती है। पारंपारिक अधिकारों को पुनः स्थापित किया जाए एवं जनजाति संस्कृति-परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन का प्रयास किया जाए। इसी दिशा में उन सभी संगठनों का अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद स्वागत एवं अभिनंदन करती है जो इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद भी इस दिशा में सामाजिक अनुभूति, संवेदना चल शिबिर, जनजातीय छात्र युवा संसद तथा अंतर राज्य छात्र जीवन दर्शन जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सतत प्रयासरत है एवं सांस्कृतिक परंपरा संरक्षण के साथ-साथ समाज अपने राष्ट्रभक्त महापुरुषों का अनुसरण करें। इस दिशा में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आगे भी संकल्पित है।

जनजातीय समाज राष्ट्र की धरोहर है इसकी सुरक्षा संवर्धन एवं विकास हमारी जिम्मेदारी है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जनजातीय समाज के विकास संरक्षण एवं संवर्धन हेतु युवा छात्रशक्ति से आह्वान करती है कि अपने योगदान हेतु संकल्पित हो। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अपनी जिम्मेदारी समझते हुए, यह मांग करती है कि,

1.     भगवान बिरसा मुंडा एवं अन्य महापुरुषों के जन्म स्थली को भी राष्ट्रीय तीर्थ स्थली घोषित किया जाए।

2.     शैक्षणिक संस्थानों एवं छात्रों को दी जानेवाली छात्रवृत्तियों का नाम भी जनजातियां महापुरुषों के नाम पर रखा जाए।

3.     छात्र अनुपात के आधार पर सर्वसुविधायुक्त छात्रावास एवं महंगाई सूचकांक के आधार पर छात्रवृत्ति उपलब्ध कराई जाए।

4.     जनजातीय महानायकों पर विश्वविद्यालयों में संगोष्ठी-सेमिनार एवं जन्मतिथियों में उत्सव आयोजित किए जाए।

5.     जनजाति भाषाओंका संवर्धन, संरक्षण एवं शोध कार्य को प्रोत्साहित किया जाए।

6.     महापुरुषों के इतिहास को इतिहास के पाठ्यक्रम में जोड़ा जाए।

7.     वन आधारित उद्योगों के विस्तार एवं विकास हेतु विशेष नीतियां बनाई जाए।

8.     वन-कृषि उत्पादों का उचित मूल्य दिया जाए एवं संबंधित क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाए।

9.     आर्थिक सशक्तिकरण हेतु विशेष रोजगार उन्मुखी नीतियां बनाई जाए।

10.    जनजातीय समाज की पारंपरिक ज्ञान को संजो के रखने का काम किया जाए।

11.    जनजातीय समाज के विस्थापन को रोकने एवं भूमि सुरक्षा हेतु विशेष कानून एवं नीतियां बनाई जाए।

12.    नियमित समय अंतराल में जनजाति समाज के शिक्षा एवं आर्थिक स्थिति को लेकर सर्वे होना चाहिए।

13.    जनजातीय सुदूरवर्ती क्षेत्रों में दूरसंचार एवं यातायात व्यवस्था दुरुस्त की जाए।

 

 

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद

63 वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन

30 नवंबर, 1-3 दिसंबर 2017, राँची (झारखण्ड)

प्रस्ताव क्र. 3

सेना के शौर्य से सुरक्षित होता भारत

भारतीय सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक, डोकलाम अभियान एवं हाल ही में जम्मू कश्मीर में चल रहे ऑपरेशन  ‘ऑल आउट’ के सफल कदम से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद गौरव महसूस कर रही हैं। सेना के साहसिक कदम से एक तरफ आज जम्मू कश्मीर शांति की ओर अग्रसर है, वहीं दूसरी ओर नक्सल प्रभावित राज्यों के नक्सल नेताओंके आत्मसमर्पण के वजह से भारत संपूर्ण रूप से सुरक्षित होता भी दिख रहा है। नोटबंदी, सीपीईसी (CPEC), जीएसटी (GST) के साथ अंतर्राष्ट्रीय अदालत में दलवीर भंडारी के निर्वाचित होने के साथ-साथ सुरक्षा विषय में भी उचित प्रतिक्रिया देकर भारत वैश्विक स्तर पर एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है। अभाविप का 63 वां राष्ट्रीय अधिवेशन इसे भारतीय सेना की रणनीति व सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति और कूटनीति की बड़ी जीत मानती है।

अभाविप का स्पष्ट मानना है कि जम्मू कश्मीर में 3 दशकों से चल रहे आतंकवाद से निपट पाना संभव नहीं हो पा रहा था और आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद प्रदेश की परिस्थिति और खराब हो गई थी। लेकिन भारतीय सेना की दृढ़ इच्छाशक्ति से जुलाई माह में प्ररंभ ऑपरेशन  ‘ऑल आउट’ से जम्मू कश्मीर में बड़ा प्रभाव दिखाई देना शुरू हो गया है। सुरक्षा एजेसिंयों द्वारा टेरर फंडिंग पर शिकजा कसने से कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी नियंत्रण में आई है। भारतीय सेना ने जम्मू कश्मीर के 13 जिलों को चिन्हित कर 258 आतंकवादीयों की सूची बनाई जिसमें 130 स्थानीय व 128 विदेशी आतंकवादी थे। सेना के ऐतिहसकि ऑल आउट ऑपरेशन में २ अगस्त को लश्कर-ए-तैयबा के अबु दुजाना, जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर सब्जार भट्ट और 26/11 का मुख्य साजिशकर्ता व मसूद अजहर का भतीजा जाकिर उर रहमान को मार गिराने में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। 21 नवम्बर तक भारतीय सेना ने 190 आतंकवादियों को मार कर आतंकी संगठनों की कमर तोड़ दी है। अभाविप का यह राष्ट्रीय अधिवेशन सुरक्षा बल द्वारा किए गए इस पराक्रम का अभिनंदन करता है।

ऑपरेशन  ऑल आउट के साथ सुरक्षा बलों ने कश्मीर घाटी के 67 युवा आतंकियों व 700 नये पत्थरबाजों को भी मुख्यधारा में लाने में महत्वपूर्ण सफलता प्रप्त की। फुटबॉल खिलाड़ी से आतंकी बने माजिद खान को वापस मुख्यधारा में लाकर जम्मू कश्मीर के युवाओं के मन में भारतीय सेना ने सकारात्मक प्रभाव डाला है। भारतीय सेना के सफल अभियान से बौखला कर जम्मू कश्मीर के देशद्रोही व कुछ राजनीतिक पार्टी के नेता राष्ट्र विरोधी बयान दे रहे है। अभाविप का राष्ट्रीय अधिवेशन ऐसे देशद्रोहियों का कठोर शब्दों में निंदा करता है।

अभाविप का स्पष्ट मानना है कि इस वर्ष सुरक्षा बलों द्वारा 23 अगस्त को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा और झारखंड के पलामू जिला में भारी मात्रा में विस्फोटक सामान पकड़ा जाना सीपीआई एक की बड़ी घटना के षडयंत्र को उजागर करता है। सुरक्षा बलों द्वारा सार्थक प्रयास से नक्सल प्रभावित राज्यों में एरिया कमांडर सुधाकरन, कमांडर अजय उरांव और बालक खेरवार ने लोहरदगा व 9 नक्सलियो ने दंतेवाड़ा में आत्मसमर्पण किया है। इस घटनाक्रम से प्रतीत होता है कि लोगों का माओवादी सिद्धांतों से मोहभंग हो रहा है।

अमेरिका द्वारा 16 अगस्त 2017 को हिजबुल मुजाहिद्दीन को विदेशी आतंकी सूची में डालना, 40000 रोहिंग्या मुसलमानों का व 3.5 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठी अवैध रूप से भारत में रहना एवं बड़े शैक्षणिक संस्थानों में देश विरोधी घटनाएं बढ़ना एवं ISIS के बढ़ते प्रभाव आंतरिक, सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। डोकलाम व उत्तराखंड की सीमा में चीनी सेना की घुसपैठ, अरुणाचल प्रदेश में रक्षा मंत्री और राष्ट्रपति की यात्रा पर चीन की प्रतिक्रिया भारत के प्रति चीन की ईर्ष्या को दर्शाता है। चीन द्वारा पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को लेना व डोकलाम पर अतिक्रमण करना भारत का आर्थिक रूप से कमजोर करने की साजिश है।

अभाविप का 63 वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन का मानना है कि मानवता के नाम पर रोहिंग्याओंका समर्थन व फ्रीडम ऑफ स्पीच के नाम पर देश विरोधी बयान देने वाले लोगों के खिलाफ केन्द्र सरकार कठोर कदम उठाए। साथ में केन्द्रीय सरकार ऐसे देश विरोधी शक्तियों को देश से बाहर निकालने के लिए असम के एनआरसी (NRC) जैसा महत्वपूर्ण कानून बनाए व नई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का प्रस्ताव लाए। अभाविप केन्द्रीय सरकार से मांग करती है कि वर्तमान चुनौतियों को देखते हुए विश्वविद्यालय स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन केन्द्र की स्थापना हो। ताकि देश विरोधी ताकतों से लड़ने के लिए भारतीय सेनाओंका मनोबल और बढ़े। अभाविप का यह 63 वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन देश के युवाओं एवं नागरिकों से आवाहन करता है कि ऐसे देश विरोधी शक्तियों का पर्दाफाश करें एवं उनके खिलाफ एक सशक्त सामाजिक एवं राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा करें।