ऐतिहासिक निर्णय के 50 वर्ष: 12 जून 1975 का निर्णय, भारत के संविधान, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक आदर्शों की महत्ता को सिद्ध किया- अभाविप

दि. 12 जून 2025

-:प्रेस विज्ञप्ति:-

 

ऐतिहासिक निर्णय के 50 वर्ष: 12 जून 1975 का निर्णय, भारत के संविधान, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक आदर्शों की महत्ता को सिद्ध किया- अभाविप

सत्ता के गुरूर में इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र को आपातकाल में धकेला, पर न्याय की मशाल जलती रही – 50 वर्ष बाद भी प्रासंगिक है 12 जून का निर्णय

 

आज से पचास वर्ष पूर्व, 12 जून 1975 को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में वह ऐतिहासिक घटना घटी, जिसने संविधान, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक आदर्शों की महत्ता को सिद्ध किया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को वर्ष 1971 के रायबरेली लोकसभा चुनाव में सत्ता और सरकारी तंत्र के दुरुपयोग का दोषी करार दिया। न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा द्वारा दिया गया यह निर्णय न केवल भारत के न्यायिक इतिहास में साहस और निष्पक्षता की मिसाल था, बल्कि इसने यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति संविधान और कानून से ऊपर नहीं हो सकता। इस निर्णय में श्रीमती गांधी का निर्वाचन निरस्त किया गया तथा उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया गया। परंतु न्याय के इस प्रकाशपुंज के सामने सत्ता के अहंकार ने घोर अंधकार का रास्ता चुना। नैतिक जिम्मेदारी लेकर त्यागपत्र देने के बजाय, उन्होंने सत्ता बचाने के लिए लोकतंत्र को ही गिरवी रख दिया। 25 जून 1975 को आपातकाल थोपकर देश को भय, दमन और निरंकुशता के गर्त में धकेल दिया गया।

 

आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय बना, जिसमें संविधान की धज्जियाँ उड़ीं, प्रेस की आवाज़ कुचली गई, न्यायपालिका पर अंकुश लगाया गया और लाखों राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं को केवल विचारों की स्वतंत्रता के लिए जेल में डाल दिया गया। उस समय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करते हुए लोकतंत्र की मशाल जलाए रखी। लोकतंत्र की हत्या से पहले का यह निर्णय एक प्रकार से शंखनाद था, जिसने समूचे राष्ट्र को सतर्क कर दिया कि सत्ता का दुरुपयोग किस तरह लोकतंत्र को समाप्त कर सकता है।

 

अभाविप के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा, “12 जून का यह ऐतिहासिक निर्णय भारत के लोकतंत्र का आत्मसम्मान था, जिसे सत्ता के नशे में चूर तत्कालीन सरकार ने रौंदने का दुस्साहस किया। यह दिन हमें सचेत करता है कि जब सत्ता तानाशाही की ओर बढ़ती है, तब संविधान, संस्थाएं और जन-स्वतंत्रता सबसे पहले खतरे में आ जाते हैं। अभाविप युवाओं से आह्वान करता है कि वे इतिहास से सीख लेकर, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान की गरिमा की रक्षा के लिए सदैव सतर्क और संघर्षशील रहें। यही राष्ट्रभक्ति का सच्चा रूप है और यही भारत के स्वाभिमानी और लोकतांत्रिक भविष्य की नींव है। आज, जब लोकतंत्र को नए-नए रूपों में चुनौती दी जा रही है, तब युवाओं का जागरूक और वैचारिक रूप से सशक्त होना अत्यंत आवश्यक है। अभाविप उन सभी न्यायप्रिय शक्तियों को नमन करता है जिन्होंने 1975 में तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष किया और आज की पीढ़ी को यह संकल्प दोहराने का अवसर प्रदान किया कि भारत कभी भी किसी भी रूप में अधिनायकवाद को स्वीकार नहीं करेगा।”

(यह प्रेस विज्ञप्ति केन्द्रीय कार्यालय मंत्री श्री सौरभ पाण्डेय द्वारा जारी की गई है)

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