7 सितंबर 1993 महाराष्ट्र का विराट विद्यार्थी मोर्चा का स्मरण

 

फोटोग्राफर मोहन बाने पूरे मार्च को कैद करना चाहते थे, लेकिन उन्हें इसके लिए कई मंजिलों पर चढ़ना पड़ा, लेकिन अंत उनके कैमरे में कैद नहीं हो सका। ‘7 सितंबर 1993’ अभूतपूर्व मार्च को आज 29 साल पूरे हो गए। 1980 का दशक समग्र रूप से एक चुनौतीपूर्ण दशक था | जबकि कश्मीर, पंजाब जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर जागरूकता आंदोलन करते हुए, विद्यार्थी परिषद ने भी शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी ताकत पैदा की थी। चूंकि कार्यकर्ताओं के दल मजबूत थे, सभी का मानना था कि यह जन आंदोलन अपने आधार पर खड़ा हो सकता है। 1991 में हुई प्रांत कार्यकारिणी की बैठक में इन मुद्दों पर बहुत चर्चा हुई। एक लाख छात्रों को मार्च करने का एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण निर्णय लिया गया। विधान भवन यह इतना आसान नहीं था। 7 सितंबर 1993 को तिथि निर्धारित की गई थी। छात्र परिषद की संरचना के अनुसार, यह तय किया गया था कि विदर्भ प्रांत अलग होने के बावजूद यह मार्च संयुक्त होना चाहिए। कार्यकर्ता बड़ी ऊर्जा के साथ काम में लग गए। कॉलेज परिसरों में भारी आक्रोश था। बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार। प्रशासन में प्रशासकीय व्यवस्थापन की उदासीनता के विरुद्ध वातावरण था।  योजना बनाई गई , इसे साकार करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी। मुंबई विश्वविद्यालय के स्नातक हॉल में ‘आरम्भ है प्रचंड’ इस पंक्ति से समान महाराष्ट्र के छात्र नेताओं का सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुई। इस सम्मेलन में ‘उठ दोस्ता उगार मुठ, शिक्षणाच्या बाजारातील तूच थांबव तुझी लुट’ यह महाराष्ट्र के छात्रशक्ति का उद घोष हूवा। श्री राजेश पांडे, मा. बालासाहेब आपटे, मा. अरुण जेटली के भाषण बहुत प्रभावशाली थे। इस समेल्लन में पूरे महाराष्ट्र से सम्मिलित हुए छात्रनेताओं ने एक लाख छात्रो का मार्च निकालने प्रण किया। 

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विभिन्न समस्याओं के मुद्दों का संकलन गांव, शहर, जिला स्तर पर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों के आयोजन कर मोर्चा की तीव्रता और माहौल कर किया गया । छात्र कार्यकर्ता शहरों से लेकर गाँवों तक कॉलेज के छात्रों तक पहुँचने लगे।सभी स्तरों पर शैक्षिक समस्याओं का अध्ययन, बैठकें, सर्वेक्षण और प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से छात्रो मोर्चा की जागरूकता कार्यकर्ता कर रहे थे । पूरे महाराष्ट्र में शैक्षिक आंदोलन का हड़कंप मच गया।

महाराष्ट्र के कोने-कोने से जागरूकता फैलाई जा रही थी। उस समय वॉल, पेंटिंग पोस्टरों के माध्यम से माहौल बनाया जाता था और पूरे महाराष्ट्र में ऐसा तूफानी माहौल बनाया गया था। विराट विद्यार्थी मोर्चा अब केवल विद्यार्थी परिषद का हिस्सा नहीं था, बल्कि संपूर्ण महाराष्ट्र के छात्र जगत का विषय बन गया था। अंतिम चरण में मार्च के लिए पंजीकरण शुरू हुआ। इस व्यापक आंदोलन में छात्राओ की भागीदारी भी महत्वपूर्ण रही। मार्च की योजना बनाने, माहौल बनाने और भाषण देने में छात्राओ की समान भागीदारी थी। मार्च के लिए कोंकण, पश्चिम महाराष्ट्र, विदर्भ, खान्देश, मराठवाड़ा, जनजाति क्षेत्र इन सभी हिस्सों से छात्रों को मुंबई लाना एक बड़ी चुनौती थी। विद्यार्थी परिषद के पूर्व कार्यकर्ता, संघ परिवार के  कार्यकर्ताओं द्वारा सभी प्रकार के व्यवस्था की रचना लगाई गयी थी। जिसमे वाहन, भोजन एवं छात्राओं के लिए अलग से पंजीयन केंद्र, स्वागत कक्ष की भी रचना की गयी । इन सभी व्यवस्था में विद्यार्थी परिषद के पूर्व कार्यकर्ता व संघ परिवार का बहोत बड़ा योगदान रहा। आने वाले प्रत्येक छात्र का पंजीकरण केंद्र में पंजीकरण किया गया था | इस माध्यम से संख्या का सटीक आकलन हो रहा था जैसे ही मार्च की सटीक संख्या ज्ञात हुई, तो ध्यान में आया की यह मार्च बहुत बड़ा ही विराट होने वाला है। 

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अंतत: मार्च का दिन नजदीक आया। मुंबई में वॉल पेंटिंग, बैनर, पोस्टर, झंडों के साथ मार्च का माहौल तूफानी हो गया था। अखबारों में एक के पश्चात के एक स्तम्भ में खबरें छप रही थीं। पहली बैच से आने वाले छात्रों की तैयारी मुंबई के पुराने कार्यकर्ताओं ने संघ परिवार के सहयोग से बखूबी की। हर स्टेशन पर स्वागत कक्ष हर बस स्टैंड पर स्वागत कक्ष जहां से मार्च के लिए आने वाले छात्रों और छात्रों के वाहनों को पार्किंग की व्यवस्था की जाती रही। गिरगांव चौपाटी पर छात्रों का एक अथाह समुद्र फैला हुआ था। और मार्च का प्रत्यक्ष दिन आ गया| यह मार्च छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के पास आजाद मैदान से शुरू होने वाला था। ट्रक्स , लोकल ट्रेनों से छात्र सुबह से आजाद मैदान आने लगे | दक्षिण मुंबई की ओर जाने वाली हर सड़क छात्रों से भरी हुई थी। 

“शिक्षण आमच्या हक्काच नाही कुणाच्या बापाच”, “उठ मित्रा उगार मुठ शिक्षणाच्या बाजारातील तूच तुझी थांबवा लूट”  “रस्त्यावर येण्याची तुझ्या मध्ये हिमंत आहे- रस्त्यावर आलास तरच तुला येथून पुढे किंमत आहे”

ऐसी घोषणाओं से आजाद मैदान हिल गया और 12 बजे मार्च आजाद मैदान से विधान भवन तक चलने लगा.. मार्च बहुत बड़ा था। प्रशासन सतर्क था परन्तु छात्रो की संख्या देख वह बोखला गये। छात्रों में रोष और आक्रोश था, लेकिन बहुत धैर्य था। मार्च का उद्देश्य मुंबई के लोगों के लिए नारों को प्रदर्शित करने वाले तख्तियों और बैनरों से स्पष्ट था। वे बड़ी उत्सुकता से मार्च को देख रहे थे, मोर्चा का स्वरुप जितना विराट था उतनी ही उसके अनुशासन का दृश्य लोगो के लिए आश्चर्यजनक था । कुछ ही समय में यह मार्च काला घोड़ा के पास पहुँच गया जहा एक भव्य जनसभा में यह मार्च परिवर्तित होने वाला था। मार्च काला घोड़े तक पहुँच गया फिर भी आजाद मैदान से अभी भी छात्रो का बड़ा समुदाय बहार निकल रहा था साथ ही रास्ते पर भी छात्रो के बड़े- बड़े समूह मोर्च में सम्मिलित हो रहे थे। 

काला घोडा परिसर में सहभागी छात्रो के नारों से गूंज रही थी। साथ ही विद्यार्थी परिषद के कला मंच ऑर्केस्ट्रा ने सरकार की नींद उड़ा दी। “या सरकारची झोप उडाली आली आली अभाविप आली” ऐसे गीतों का प्रदर्शन हूवा। इस पश्चात विदर्भ प्रांत मंत्री सुनील राजे के भाषण से जन सभा की शुरुआत हुई । इसी बीच राजेश पांडेय के नेतृत्व में मोर्चा का एक प्रतिनिधिमंडल शिक्षा मंत्री से मिलने गया। मंत्रालय प्रशासन और कैबिनेट इस मोर्चे से इतना डर गया था कि शिक्षा मंत्री मंत्रालय से भाग गए। छात्रो के विभिन्न मांगो के ज्ञापन को शिक्षा मंत्री के केबिन के बहार लगा दिया गया ।

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मार्च अभूतपूर्व था | जो छात्र आए वे चिल्ला रहे थे, गुस्से में थे,  फिर भी संयमित थे। कई पत्रकार मार्च को कवर करने के लिए दौड़ रहे थे। लेकिन पूरे मार्च को अपने कैमरे में कैद नहीं किया जा सका। कई पत्रकार मार्च के बारे में उत्सुक थे। छात्रों के साथ मिलकर, ये पत्रकार छात्रों से पूछने की कोशिश कर रहे थे कि वे किस कारण से आए थे। छात्र केवल अकादमिक मुद्दों के बारे में बात कर रहे थे। कुछ अलग मिलेगा और बड़ी खबर मिलेगी । मोर्चे को बदनाम करने की पत्रकारों की सारी कोशिशें नाकाम रहीं । इस मार्च के कारण विद्यार्थी परिषद के प्रति महाराष्ट्र का नजरिया बदल गया। विद्यार्थी परिषद, जिस पर एक छोटा कार्यक्रम करनेवाला संगठन होने का आरोप लगाया गया था, अब एक जन आंदोलन बन गया।

 कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम के कारण यह मार्च निकाला गया।

महाराष्ट्र के कोने-कोने में पहुंची विद्यार्थी परिषद। यह विशाल छात्र मार्च इस बात का उदाहरण है कि अगर कार्यकर्ताओं की रचना मजबूत और प्रेरित हों तो क्या चमत्कार हो सकता हैं ?

 

(यह लेख श्री श्री सतीश कुलकर्णी, पूर्व प्रदेश सह संगठन मंत्री (महाराष्ट्र अभाविप) द्वारा 07 सितंबर 2022 को लिखा गया था)

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Submitted by SARKARIYOJANA56 on Wed, 03/29/2023 - 22:57

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ऐसी घोषणाओं से आजाद मैदान हिल गया और 12 बजे मार्च आजाद मैदान से विधान भवन तक चलने लगा.. मार्च बहुत बड़ा था। प्रशासन सतर्क था परन्तु छात्रो की संख्या देख वह बोखला गये। छात्रों में रोष और आक्रोश था, लेकिन बहुत धैर्य था। मार्च का उद्देश्य मुंबई के लोगों के लिए नारों को प्रदर्शित करने वाले तख्तियों और बैनरों से स्पष्ट था। वे बड़ी उत्सुकता से मार्च को देख रहे थे, मोर्चा का स्वरुप जितना विराट था उतनी ही उसके अनुशासन का दृश्य लोगो के लिए आश्चर्यजनक था । कुछ ही समय में यह मार्च काला घोड़ा के पास पहुँच गया जहा एक भव्य जनसभा में यह मार्च परिवर्तित होने वाला था। मार्च काला घोड़े तक पहुँच गया फिर भी आजाद मैदान से अभी भी छात्रो का बड़ा समुदाय बहार निकल रहा था साथ ही रास्ते पर भी छात्रो के बड़े- बड़े समूह मोर्च में सम्मिलित हो रहे थे।